गढ़वा। भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में डॉ. संध्या पूरेचा एक ऐसा नाम बनकर उभरी हैं, जिन्होंने कला को केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। वर्तमान में संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष के रूप में वे कला-जगत को नई दिशा दे रही हैं।
डॉ. पूरेचा ने “मीट द आर्टिस्ट” कार्यक्रम के माध्यम से देशभर के कलाकारों से सीधा संवाद स्थापित किया है। इस पहल के तहत वे स्वयं विभिन्न राज्यों में जाकर कलाकारों की समस्याओं, चुनौतियों और संभावनाओं पर चर्चा करती हैं। इससे कला प्रशासन और कलाकारों के बीच की दूरी कम हुई है।
उन्होंने भारतीय कला के भविष्य के लिए “साधना (SADHANA)” की अवधारणा प्रस्तुत की है, जो पाँच स्तंभों—विरासत संरक्षण, गुरु-शिष्य परंपरा, शास्त्र-व्यवहार समन्वय, नवाचार और सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर—पर आधारित है।
डॉ. पूरेचा का मानना है कि संस्कृति केवल संग्रहालयों में सुरक्षित रखने की वस्तु नहीं, बल्कि समाज में जीवित रहने वाली प्रक्रिया है। इसी सोच के तहत अकादमी द्वारा कला दीक्षा, कला संवाद और कला धरोहर जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।
गुरु-शिष्य परंपरा को वे भारतीय कला की आत्मा मानती हैं। उनका कहना है कि कला केवल तकनीक नहीं, बल्कि संस्कार और संवेदना का माध्यम है, जो गुरु के सान्निध्य में ही विकसित होता है।
उन्होंने शास्त्र और मंच के बीच संवाद को भी आवश्यक बताया है। नाट्यशास्त्र और संगीत रत्नाकर जैसे ग्रंथों की प्रासंगिकता को आज के संदर्भ में जोड़ते हुए वे शोध और प्रयोग दोनों को समान महत्व देती हैं।
डॉ. पूरेचा के नेतृत्व में भारत मंडपम्, जी-20 शिखर सम्मेलन और “गंधर्व अयोध्या” जैसे भव्य आयोजनों ने भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है। इन आयोजनों ने यह साबित किया है कि भारतीय कला परंपरा और आधुनिकता का संतुलित संगम है।
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