गढ़वा। नदियाँ केवल जलधारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, संस्कृति और जीवन की आधारशिला हैं। इनके बिना मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं है। शरीर में रक्त प्रवाह की तरह नदियाँ पृथ्वी को जीवंत बनाए रखती हैं। खेतों की हरियाली, पशु-पक्षियों का अस्तित्व, पेड़-पौधों की ताजगी और समाज की समृद्धि—सभी कुछ नदियों पर निर्भर है।
यह बातें कला साधिका संध्या सुमन ने कही। उन्होंने कहा कि आज आधुनिकता और लापरवाही के कारण नदियाँ लगातार प्रदूषण का शिकार हो रही हैं। लोग स्वच्छता की बात तो करते हैं, लेकिन पूजा-पाठ, त्योहारों और दैनिक जीवन में प्लास्टिक व कचरा नदियों में बहा देते हैं, जो आगे चलकर गंभीर संकट का रूप ले लेता है।
उन्होंने कहा कि नदी प्रदूषण का असर केवल जल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण पर पड़ता है। इसलिए सबसे पहले हमें स्वयं जागरूक बनने की जरूरत है। यदि हर व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह नदियों को गंदा नहीं करेगा, तो बदलाव निश्चित है।
संध्या सुमन ने कहा कि प्रकृति केवल वर्तमान पीढ़ी की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है। यदि आज नदियों की रक्षा नहीं की गई, तो भविष्य में जल संकट और पर्यावरणीय समस्याएं और गंभीर हो जाएंगी।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि प्लास्टिक का उपयोग कम करें, जल स्रोतों को स्वच्छ रखें, वृक्षारोपण करें और दूसरों को भी जागरूक करें। उन्होंने कहा कि नदियाँ केवल बहता पानी नहीं, बल्कि जीवन और भविष्य की पहचान हैं। इसलिए हम सभी को मिलकर इन्हें स्वच्छ और सुरक्षित रखने का संकल्प लेना चाहिए।
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