गढ़वा। पर्यावरण संरक्षण को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच पर्यावरण प्रेमी पुरुषोत्तम ने समाज को जागरूक करते हुए कहा कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आज भी समाज और सरकार मिलकर नदियों एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं हुए, तो आने वाला समय अत्यंत भयावह हो सकता है।
उन्होंने कहा कि नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों की जीवनरेखा हैं। बदलते पर्यावरण, बढ़ते तापमान और घटते जलस्तर ने आज पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। धरती धीरे-धीरे सूखती जा रही है और नदियों का प्रदूषण मानवता के लिए गंभीर संकट बनता जा रहा है।
पुरुषोत्तम ने बताया कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोग अपनी जिम्मेदारियों से दूर होते जा रहे हैं। नदियों में अब जल से अधिक गंदगी दिखाई देती है। घरों की नालियाँ, प्लास्टिक कचरा, फैक्ट्रियों के रासायनिक अपशिष्ट सहित अन्य वेस्ट सीधे नदियों में डाले जा रहे हैं, जिससे नदियाँ दम तोड़ रही हैं।
उन्होंने सरकारों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण न तो सरकारों की प्राथमिकताओं में शामिल रहा और न ही यह जनता की प्रमुख मांग बन पाया। यही कारण है कि झारखंड सहित देश के कई हिस्सों में भीषण जल संकट उत्पन्न हो चुका है। कहीं पीने का पानी उपलब्ध नहीं है, तो कहीं लोग जान जोखिम में डालकर पानी का इंतजाम कर रहे हैं।
उन्होंने चिंता जताई कि जल संकट का असर केवल इंसानों पर ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और अन्य जीवों पर भी पड़ रहा है। प्रदूषण और पानी की कमी के कारण असंख्य जीव-जंतुओं की मृत्यु हो रही है, लेकिन यह स्थिति न तो सरकार की चिंता का कारण बन पा रही है और न ही व्यवस्था को झकझोर पा रही है।
पुरुषोत्तम ने अपील करते हुए कहा कि यदि अब भी समाज नहीं जागा, तो पर्यावरणीय विनाश और जल संकट और भी विकराल रूप ले सकता है। इसलिए जरूरी है कि लोग स्वयं आगे आकर अपने क्षेत्र की नदियों, तालाबों और जलस्रोतों की स्वच्छता एवं संरक्षण के लिए सामूहिक पहल करें।
उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए वर्तमान में सुधार करना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण केवल एक अभियान नहीं, बल्कि जीवन बचाने का संकल्प है।
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