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नवोदित रचनाकारों की प्रतिभा का संगम बना “काव्यानुरागी” का 15वाँ आयोजन

गढ़वा : नवोदित रचनाकारों को समर्पित नियमित मासिक साहित्यिक आयोजन “काव्यानुरागी” का 15वाँ संस्करण रविवार को बंधन मैरिज हॉल, नवादा मोड़, गढ़वा में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कला, साहित्य और संस्कृति के समागम से सजे इस आयोजन में जिले के अनेक कवि, साहित्यकार, शिक्षक, कलाकार एवं साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कार्यक्रम ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि गढ़वा की साहित्यिक चेतना निरंतर नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर है।
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान नटराज की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं पुष्प अर्पण के साथ हुआ। इसके बाद सरस्वती वंदना “या कुंदेन्दु तुषार हार धवला...” की मधुर प्रस्तुति डॉ. टी. पीयूष ने दी, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
साहित्यकार प्रमोद कुमार ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि “काव्यानुरागी” पिछले दो वर्षों से नवोदित रचनाकारों को मंच प्रदान कर रहा है और कई प्रतिभाएं यहां से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी हैं। उन्होंने पं. हर्ष द्विवेदी कला मंच को साहित्य की नई पौध को संवारने वाला सशक्त माध्यम बताया।
काव्य पाठ के क्रम में कवि श्रवण शुक्ल ने राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत रचना प्रस्तुत कर श्रोताओं में उत्साह भर दिया। शिक्षक कवि धर्मेंद्र कुमार पुष्कर ने अपनी व्यंग्य रचना के माध्यम से समाज की संवेदनहीनता पर तीखा प्रहार किया। वहीं डॉ. टी. पीयूष ने प्रेरणादायक कविता के जरिए युवाओं में आत्मविश्वास और संघर्ष की भावना जगाई।
कवि गंगेश पांडेय ने किसानों की पीड़ा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया, जबकि अधिवक्ता जयपूर्णा विश्वकर्मा ने जीवन में सकारात्मक सोच का संदेश दिया। प्रमोद कुमार की दांपत्य जीवन पर आधारित भावपूर्ण रचना ने श्रोताओं को भावुक कर दिया।
कार्यक्रम में जय प्रकाश विश्वकर्मा, नीरज कुमार, सौरभ कुमार तिवारी एवं दीपक शुक्ल ने भी अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधा। सभी रचनाकारों ने समाज, प्रेम और मानवीय मूल्यों को अपनी रचनाओं में प्रभावशाली अभिव्यक्ति दी।
वरिष्ठ पत्रकार विवेकानंद उपाध्याय ने कहा कि “काव्यानुरागी” गढ़वा की रचनाधर्मिता को निरंतर पल्लवित करने वाला एक सशक्त मंच बन चुका है, जो समाज को नई दिशा देने का कार्य कर रहा है।
कार्यक्रम का संचालन पं. हर्ष द्विवेदी कला मंच के निदेशक नीरज श्रीधर ‘स्वर्गीय’ ने किया। आयोजन को सफल बनाने में संस्कार भारती गढ़वा इकाई के संरक्षक विजय सोनी सहित अनेक साहित्यप्रेमियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
अंत में “वंदे मातरम्” के सामूहिक गान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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