गढ़वा। भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा में कला को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने और समाज को संस्कारों से जोड़ने वाली शक्ति माना गया है। इसी क्रम में रंगकर्म को विशेष महत्व देते हुए संस्कार भारती झारखंड प्रांत के प्रांतीय कला धरोहर संयोजक नीरज श्रीधर ‘स्वर्गीय’ ने कहा कि “रंगकर्म इस सृष्टि का सबसे पवित्र कर्म है।”
उन्होंने कहा कि भारतीय रंगपरंपरा का आधार आचार्य भरतमुनि द्वारा रचित ‘नाट्यशास्त्र’ है, जिसे ‘पंचम वेद’ की संज्ञा दी गई है। इसमें संगीत, नृत्य, अभिनय, संवाद और काव्य के माध्यम से जीवन के विविध आयामों को सरल और प्रभावी रूप में समाज तक पहुँचाने की परिकल्पना की गई है।
नीरज श्रीधर ने बताया कि रंगमंच केवल अभिनय का मंच नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक साधना है, जहां कलाकार अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से ऊपर उठकर विभिन्न चरित्रों को आत्मसात करता है। इस प्रक्रिया में वह संवेदनशीलता, अनुशासन और सह-अस्तित्व जैसे मूल्यों को भी आत्मसात करता है।
उन्होंने कहा कि रंगकर्म सामूहिक प्रयास का परिणाम होता है, जिसमें अभिनेता के साथ-साथ निर्देशक, लेखक, संगीतकार, मंच सज्जाकार और नेपथ्य में कार्य करने वाले सभी लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कला व्यक्ति को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाती है।
भारतीय रंगपरंपरा की विविधता का उल्लेख करते हुए उन्होंने रामलीला, रासलीला, नौटंकी, यक्षगान, कथकली और छऊ जैसी लोक एवं शास्त्रीय रंगशैलियों को हमारी सांस्कृतिक धरोहर बताया। विशेष रूप से झारखंड की लोकपरंपराओं में रंगकर्म की समृद्ध परंपरा को उन्होंने गौरवपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में, जब लोगों के बीच प्रत्यक्ष संवाद कम होता जा रहा है, रंगमंच लोगों को एक साथ बैठकर अनुभव साझा करने का अवसर देता है। यह समाज का दर्पण होने के साथ-साथ मार्गदर्शक भी है, जो सामाजिक विसंगतियों, पर्यावरण, नारी सम्मान और मानवीय मूल्यों जैसे विषयों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।
अंत में उन्होंने कहा कि रंगकर्म मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की साधना है। यह केवल प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व है। इसलिए रंगमंच को केवल देखने की नहीं, बल्कि उसे जीने और साधना के रूप में अपनाने की आवश्यकता है।
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