गढ़वा। पूजा-पर्वों के दौरान स्थापित की जाने वाली प्रतिमाएं जहां हमारी समृद्ध कला, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक हैं, वहीं उनके निर्माण में उपयोग होने वाली सामग्रियों का पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव भी गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। इसी संदर्भ में संस्कार भारती झारखंड प्रांत के प्रांतीय कला धरोहर संयोजक एवं पं. हर्ष द्विवेदी कला मंच, नवादा, गढ़वा के निदेशक नीरज श्रीधर ने मूर्तिकारों और पूजा समितियों से पर्यावरण हितैषी प्रतिमाओं के निर्माण व उपयोग की अपील की है।
नीरज श्रीधर ने कहा कि प्रतिमाओं के विसर्जन के दौरान उनमें प्रयुक्त रासायनिक रंग और अन्य हानिकारक पदार्थ नदियों, तालाबों व जलाशयों के जल को प्रदूषित कर देते हैं। इससे जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है और जलीय जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया में शुरुआत से ही पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए प्रकृति की रक्षा करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
नीरज श्रीधर ने मूर्तिकारों से आग्रह किया कि वे प्रतिमाओं के निर्माण में मिट्टी, प्राकृतिक रंगों एवं अन्य पर्यावरण अनुकूल सामग्रियों का अधिक से अधिक उपयोग करें। इससे न केवल पारंपरिक मूर्तिकला को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि विसर्जन के बाद जल स्रोतों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा।
उन्होंने पूजा समितियों और श्रद्धालुओं से भी अपील की कि वे प्रतिमा खरीदते समय उसके निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की जानकारी लें और पर्यावरण हितैषी प्रतिमाओं को प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि मूर्तिकार, पूजा समितियां और आम नागरिक मिलकर ऐसी परंपरा विकसित कर सकते हैं, जिसमें श्रद्धा के साथ प्रकृति संरक्षण का संकल्प भी जुड़ा हो।
उन्होंने अंत में कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी हुई है। पूजा-पर्व जैसे पवित्र अवसरों को पर्यावरण संरक्षण के संदेश से जोड़कर समाज के सामने एक सकारात्मक और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है।
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